घर की गलियों में कॉलेज

इन दिनों, सीढ़ियों से भागते हुए नीचे टेलीविजन वाले कमरे में पहुंचना मेरा आदतन काम बन गया है। “बबुआ, आज गाना सुनने के लिए तो डिश रिचार्ज करना होगा,” पीछे से भौजी की मजाकिया आवाज़ आई। रिचार्ज करके रिमोट से चैनल 809 पर ट्यून किया, जहां शाहिद कपूर मस्ती में हाईवे पर रॉयल एनफील्ड दौड़ाContinue reading “घर की गलियों में कॉलेज”

चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ

मेरे पुराने घर के वेंटिलेटर पर,हमेशा ही गौरैयों का घोसला लगा रहता।रोज शाम को ठीक चार बजे,वे नीचे उतर कर खिड़की पर बैठ जातीं,मेरे इंतज़ार में। गांव के सरकारी स्कूल की पीछे की दीवार को फांदकर,अपना बस्ता लेकर भागता हुआ,घर की दीवारों, दरवाज़ों से टकराते हुए,आखिरी कमरे तक पहुँचता,जहां पर पहले से ही मेरी माँContinue reading “चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ”

इतवार की बेचैनी

ये इतवार भी क्या गजब ढा गया,सुबह झटके में नींद खुली,जब सपने में तुम्हें किसी और का होते देखा।नींद उड़ी, वह अलग बात,दिन का चैन छीना,दिल को बेचैन किया।नहीं खबर मुझे कि हो क्या रहा,मनोदशा बिगड़ गई तब।अचानक से आसपास के लोग,अनचाही भीड़ लगने लगे।जिनके बीच खड़ा तो था पर,कोई समझ न पाया इस बेचैनीContinue reading “इतवार की बेचैनी”

तकिये तले खत

अब चुकि बादलों में छुप रहा आज का चाँद है,खामोशी की तलाश में गुजर रही ये रात है।अजीब सी बेचैनी हो रही है मन में,सोच रहा हूँ, एक और खत लिख दूँ तुम्हारी याद में।रख लूं तकिये के नीचे,कहीं इसी बहाने तुम ख्वाब में आ जाओ,इक मुलाकात हो जाए,और शायद हमारी बात हो जाए।

बैगनी यादें

हाँ, बाहर बारिश हो रही है,इतेफाक से उसके शहर से गुजरती है यह ट्रेन,जिसमें मैं सफर कर रहा हूँ,और पढ़ रहा हूँ उसकी पसंदीदा किताब,जिसे आखिरी मुलाकात में वो इरादतन छोड़ गई थी।यादें एक साथ चोट कर रही हैं,जब-जब चिन्हित शब्दों को मेरी निगाहें पार कर रही हैं।महसूस कर रहा हूँ उसकी उंगलियों की छुअनContinue reading “बैगनी यादें”

गोलघर की गलियों में

सुनो, कुछ मीठा खा लो, सब ठीक हो जाएगा। वैसे, अभी कहाँ हो? अरे, इधर पटना में गोलघर के पास फंसे हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करें… हताशा सा महसूस हो रहा है, पता नहीं क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि बदनसीबी मेरे हिस्से की जायदाद में किसी ने लिख दी है। अरे लल्ला,Continue reading “गोलघर की गलियों में”

वशिष्ठ जी का अवसान

कल बिहार के अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर एक ऐसी खबर छपेगी, जिससे तमाम युवा वर्ग जो गणित और भौतिकी में रुचि रखते हैं या कभी रखते थे, उनमें मातम छाएगा। कई ऐसे भी होंगे, बिल्कुल मेरी तरह, जो इस महान गणितज्ञ से कभी मिलने के सपने देखा करते थे। मैं महसूस कर सकता हूँContinue reading “वशिष्ठ जी का अवसान”

कपड़े और कविताएँ

कुछ दिन पहले की बात है,जिनके लिए इतनी सारी कथा, कहानी, किस्से लिखे,उन्होंने मुझे शायर कहा।‘सिर्फ लिखने से काम नहीं चलेगा’ ऐसा कहकर,कुछ दोस्तों ने मुझे कायर कहा। आगे की बातें करेंगे पर पहले यह बता दूँ कि ये सब मैंकपड़ा धोते वक्त सोच रहा था, कपड़े अधधुले छोड़करयह लिखने आया हूँ… क्योंकि आजकल लेखनContinue reading “कपड़े और कविताएँ”

अमावस है मेरी ज़िंदगी

कॉलेज का पहला सालअपनों से बिछड़ करदूर आ जाने के गम मेंउदास होकर होस्टल की बालकनी सेचाँद को ताकते रहताजिस रोज चाँद दूसरे हिस्से में चला जाताउस दिन पीछा करते-करतेकॉलेज की सैर पर निकल जाया करतापर साल बदला और शायद हालात भी बदलेउदासी थोड़ी कम हुई क्योंकि मेरा चाँद भी बदलापहले आसमान में ढूंढताअब ज़मीनContinue reading “अमावस है मेरी ज़िंदगी”