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मैं भीड़ में अक्सर मैं कुंठित हो जाता हूँ

पता नहीं भीड़ नहीं अपना पाती या

मैं ही भीड़ का हिस्सा नहीं बन पाता हूँ

इक बार नहीं हर बार होता है

भीड़ से निकलकर ये दिल सौ-बार रोता है

जाने कमबख्त किस ख़याल में उलझा होता है।