कॉलेज का पहला साल
अपनों से बिछड़ कर
दूर आ जाने के गम में
उदास होकर होस्टल की बालकनी से
चाँद को ताकते रहता
जिस रोज चाँद दूसरे हिस्से में चला जाता
उस दिन पीछा करते-करते
कॉलेज की सैर पर निकल जाया करता
पर साल बदला और शायद हालात भी बदले
उदासी थोड़ी कम हुई क्योंकि मेरा चाँद भी बदला
पहले आसमान में ढूंढता
अब ज़मीन पर ढूंढता फिरता
ये साल भी गुज़र गया
न आसमान वाले का दीदार हुआ
न ज़मीन वाले से बात हुई
आज साल तीसरा चल पड़ा
फिर होस्टल की बालकनी से चाँद दिखा
शिकायत थी हम दोनों की
‘पूरे साल ना तुम दिखे ना मैं दिखा, क्या वजह रही होगी?’
ये सवाल तो मेरा पहला था
पर जवाब लगा आखिरी हो- ‘तुम चाँद जिसको मान लिए
वो चाँद की बात अब करती है
तुम उसका पीछा थोड़ा कम करो
वो तुम्हारी शिकायत मुझसे ही करती है
रुको, ठहरो और इंतज़ार करो
मेरी तरह वो भी आएगी कल को’
अब सवाल नहीं रह गया कोई…
मगर ऐसा लग रहा
अगर वो चाँद है, तो अमावस है मेरी ज़िंदगी!