कपड़े और कविताएँ

कुछ दिन पहले की बात है,
जिनके लिए इतनी सारी कथा, कहानी, किस्से लिखे,
उन्होंने मुझे शायर कहा।
‘सिर्फ लिखने से काम नहीं चलेगा’ ऐसा कहकर,
कुछ दोस्तों ने मुझे कायर कहा।

आगे की बातें करेंगे पर पहले यह बता दूँ कि ये सब मैं
कपड़ा धोते वक्त सोच रहा था, कपड़े अधधुले छोड़कर
यह लिखने आया हूँ… क्योंकि आजकल लेखन शैली पर शायद मंदी की मार पड़ी है,
कुछ लिखा नहीं जा रहा या फिर जो कुछ सोच रहा हूँ वो लिख नहीं पा रहा।
खैर, इससे पहले कि भूल जाऊँ कि क्या सोचा था, बाथरूम में उसको लिख देने में ही भलाई है…

हाँ तो… किसी ने मुझे कायर कहा,
तो किसी खास ने शायर कहा।
जिन्होंने कायर कहा, उन्हें बता दें कि,
अरे, जिनके किस्से-कहानियों को लिखता आया हूँ!
को हँसाने का हुनर सीख लिया है हमने,
इतना ही नहीं, शब्दों के भाव से
भावनाओं को जताने का हुनर भी सीख लिया है हमने।
अब दिल में जगह बनाने की इजाजत दी जाए,
बिना जगह बनाए उनके खातिर लिखते रहना
थोड़ा मुश्किल है मगर उनसे स्नेह भी तो है।
फिर यह भी बता देना उनसे,
इज़हार मैं हर दफा करूँगा, बस इनकार तुम करते रहना!

आधे कपड़े पड़े हैं धोने को,
मैं धोकर आया, (🙄कपड़े) तब तक आप लोग इसे पढ़ते रहना!

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