अमावस है मेरी ज़िंदगी
कपड़े और कविताएँ
कॉलेज का पहला साल
अपनों से बिछड़ कर
दूर आ जाने के गम में
उदास होकर होस्टल की बालकनी से
चाँद को ताकते रहता
जिस रोज चाँद दूसरे हिस्से में चला जाता
उस दिन पीछा करते-करते
कॉलेज की सैर पर निकल जाया करता
पर साल बदला और शायद हालात भी बदले
उदासी थोड़ी कम हुई क्योंकि मेरा चाँद भी बदला
पहले आसमान में ढूंढता
अब ज़मीन पर ढूंढता फिरता
ये साल भी गुज़र गया
न आसमान वाले का दीदार हुआ
न ज़मीन वाले से बात हुई
आज साल तीसरा चल पड़ा
फिर होस्टल की बालकनी से चाँद दिखा
शिकायत थी हम दोनों की
‘पूरे साल ना तुम दिखे ना मैं दिखा, क्या वजह रही होगी?’
ये सवाल तो मेरा पहला था
पर जवाब लगा आखिरी हो- ‘तुम चाँद जिसको मान लिए
वो चाँद की बात अब करती है
तुम उसका पीछा थोड़ा कम करो
वो तुम्हारी शिकायत मुझसे ही करती है
रुको, ठहरो और इंतज़ार करो
मेरी तरह वो भी आएगी कल को’
अब सवाल नहीं रह गया कोई…
मगर ऐसा लग रहा
अगर वो चाँद है, तो अमावस है मेरी ज़िंदगी!
कुछ दिन पहले की बात है,
जिनके लिए इतनी सारी कथा, कहानी, किस्से लिखे,
उन्होंने मुझे शायर कहा।
‘सिर्फ लिखने से काम नहीं चलेगा’ ऐसा कहकर,
कुछ दोस्तों ने मुझे कायर कहा।
आगे की बातें करेंगे पर पहले यह बता दूँ कि ये सब मैं
कपड़ा धोते वक्त सोच रहा था, कपड़े अधधुले छोड़कर
यह लिखने आया हूँ… क्योंकि आजकल लेखन शैली पर शायद मंदी की मार पड़ी है,
कुछ लिखा नहीं जा रहा या फिर जो कुछ सोच रहा हूँ वो लिख नहीं पा रहा।
खैर, इससे पहले कि भूल जाऊँ कि क्या सोचा था, बाथरूम में उसको लिख देने में ही भलाई है…
हाँ तो… किसी ने मुझे कायर कहा,
तो किसी खास ने शायर कहा।
जिन्होंने कायर कहा, उन्हें बता दें कि,
अरे, जिनके किस्से-कहानियों को लिखता आया हूँ!
को हँसाने का हुनर सीख लिया है हमने,
इतना ही नहीं, शब्दों के भाव से
भावनाओं को जताने का हुनर भी सीख लिया है हमने।
अब दिल में जगह बनाने की इजाजत दी जाए,
बिना जगह बनाए उनके खातिर लिखते रहना
थोड़ा मुश्किल है मगर उनसे स्नेह भी तो है।
फिर यह भी बता देना उनसे,
इज़हार मैं हर दफा करूँगा, बस इनकार तुम करते रहना!
आधे कपड़े पड़े हैं धोने को,
मैं धोकर आया, (🙄कपड़े) तब तक आप लोग इसे पढ़ते रहना!