हाँ, बाहर बारिश हो रही है,इतेफाक से उसके शहर से गुजरती है यह ट्रेन,जिसमें मैं सफर कर रहा हूँ,और पढ़ रहा हूँ उसकी पसंदीदा किताब,जिसे आखिरी मुलाकात में वो इरादतन छोड़ गई थी।यादें एक साथ चोट कर रही हैं,जब-जब चिन्हित शब्दों को मेरी निगाहें पार कर रही हैं।महसूस कर रहा हूँ उसकी उंगलियों की छुअनContinue reading “बैगनी यादें”
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गोलघर की गलियों में
सुनो, कुछ मीठा खा लो, सब ठीक हो जाएगा। वैसे, अभी कहाँ हो? अरे, इधर पटना में गोलघर के पास फंसे हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करें… हताशा सा महसूस हो रहा है, पता नहीं क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि बदनसीबी मेरे हिस्से की जायदाद में किसी ने लिख दी है। अरे लल्ला,Continue reading “गोलघर की गलियों में”