माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता

किसी से वादा तो कविता नहीं लिखने का किया था न, कुछ और तो लिख ही सकते हैं। बात कुछ ऐसी है कि अब इस अकेलेपन में, जब चारों तरफ त्यौहारों की चर्चा हो रही है और हम एक बार फिर ऐन मौके पर घर से दूर रहने का फैसला ले चुके हैं, तो इसContinue reading “माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता”

चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ

मेरे पुराने घर के वेंटिलेटर पर,हमेशा ही गौरैयों का घोसला लगा रहता।रोज शाम को ठीक चार बजे,वे नीचे उतर कर खिड़की पर बैठ जातीं,मेरे इंतज़ार में। गांव के सरकारी स्कूल की पीछे की दीवार को फांदकर,अपना बस्ता लेकर भागता हुआ,घर की दीवारों, दरवाज़ों से टकराते हुए,आखिरी कमरे तक पहुँचता,जहां पर पहले से ही मेरी माँContinue reading “चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ”