4:47 AM, गांव की हवा वैसी ही है, पर कुछ बदली-बदली सी। पिछली बार जब यहां आया था, तब दिल्ली से बेंगलुरु शिफ्ट हुआ था। अब कॉरपोरेट की चकाचौंध में पूरा डूब चुका हूँ। काका ने हमेशा कहा था, “शहर चाहे जितनी तेज़ी से भागे, गांव की मिट्टी कभी छूटने नहीं देगी।” लेकिन ये हैंडपंपContinue reading “रामचनर काका 4.O: आधुनिकता का आँगन और हैंडपंप का ठंडा पानी”
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पीपल का पेड़
हर पीपल का पेड़ मुझेमेरे गाँव की याद दिलाता है,मैं बैठ जाना चाहता हूँउसके नीचे बस थोड़ी देर के लिए,इस आस में कि वो छाँव जो मुझेखेतों में भागने के बाद,घर लौटने के क्रम मेंवक़्त से वक़्त चुराकरबैठने पर मिलती थी। वो छाँव जो मुझेमेरे गाँव के इकलौते मित्रके साथ उसके आम के बगीचों में,पकते-महकतेContinue reading “पीपल का पेड़”
खिड़की से झांकते त्योहार
कोई भी त्योहार हो, आप एक बार जरूर सोचते हैं कि पिछली बार आज के दिन क्या किया था। फिर एक के पीछे दूसरी याद आती जाती है, और एक कड़ी बन जाती है यादों की, जिससे आप बहुत सारी यादों के साथ बाहर आते हैं। आप उनमें से चुनते हैं कि कौन-सा पल सबसेContinue reading “खिड़की से झांकते त्योहार”
बचपन की पगडंडियाँ
सुनो, चार साल हो गए ना—कुछ और दिन में हमारी विदाई होगी।विदाई, समझती हो ना?अरे वही, जो मिलने के बाद होता है।पर हम तो कभी मिले ही नहीं—फिर विदाई कैसी? अरे, लेखक को चाँद से भी तो मिलना है,गाँव के सबसे लंबे पेड़ से,छिपते चाँद को भी तो देखना है।अब जाते जाते इस शहर में,दुबाराContinue reading “बचपन की पगडंडियाँ”
हम बेवक्त हो चले
कुछ दिन पहले जब पूर्णिमा की रात थी,छत पर बैठकर चाँद की रौशनी में नहाया,अपने गांव को देख रहा था।कल्पना कर रहा था कि तुम छत के दूसरे कोने में खड़ी हो,और आसमान में एकटक देख रही हो,मानसून में भी बिन बादल के चाँद देख रही हो,जिसके प्रभाव से दूधिया रौशनी तुम्हारे चेहरे पर चमकContinue reading “हम बेवक्त हो चले”
गांव के पीछे चंवर
दिन रात लैपटॉप पर बैठे रहते हो, आँखों पर असर नहीं होता क्या बउवा?माँ की चिंताजनक बातों का असर था कि बारिश के बाद की ताजी हवा लेने मैं छत पर चढ़ गयानज़ारा देख मेरी आंखें चमक उठींआज तक कभी खेतों में जमे पानी में ऐसा नजारा नहीं देखा थादूर-दूर तक कोई किनारा नहीं दिखContinue reading “गांव के पीछे चंवर”
चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ
मेरे पुराने घर के वेंटिलेटर पर,हमेशा ही गौरैयों का घोसला लगा रहता।रोज शाम को ठीक चार बजे,वे नीचे उतर कर खिड़की पर बैठ जातीं,मेरे इंतज़ार में। गांव के सरकारी स्कूल की पीछे की दीवार को फांदकर,अपना बस्ता लेकर भागता हुआ,घर की दीवारों, दरवाज़ों से टकराते हुए,आखिरी कमरे तक पहुँचता,जहां पर पहले से ही मेरी माँContinue reading “चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ”