माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता

किसी से वादा तो कविता नहीं लिखने का किया था न, कुछ और तो लिख ही सकते हैं। बात कुछ ऐसी है कि अब इस अकेलेपन में, जब चारों तरफ त्यौहारों की चर्चा हो रही है और हम एक बार फिर ऐन मौके पर घर से दूर रहने का फैसला ले चुके हैं, तो इसContinue reading “माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता”

हम बेवक्त हो चले

कुछ दिन पहले जब पूर्णिमा की रात थी,छत पर बैठकर चाँद की रौशनी में नहाया,अपने गांव को देख रहा था।कल्पना कर रहा था कि तुम छत के दूसरे कोने में खड़ी हो,और आसमान में एकटक देख रही हो,मानसून में भी बिन बादल के चाँद देख रही हो,जिसके प्रभाव से दूधिया रौशनी तुम्हारे चेहरे पर चमकContinue reading “हम बेवक्त हो चले”

गांव के पीछे चंवर

दिन रात लैपटॉप पर बैठे रहते हो, आँखों पर असर नहीं होता क्या बउवा?माँ की चिंताजनक बातों का असर था कि बारिश के बाद की ताजी हवा लेने मैं छत पर चढ़ गयानज़ारा देख मेरी आंखें चमक उठींआज तक कभी खेतों में जमे पानी में ऐसा नजारा नहीं देखा थादूर-दूर तक कोई किनारा नहीं दिखContinue reading “गांव के पीछे चंवर”

घर की गलियों में कॉलेज

इन दिनों, सीढ़ियों से भागते हुए नीचे टेलीविजन वाले कमरे में पहुंचना मेरा आदतन काम बन गया है। “बबुआ, आज गाना सुनने के लिए तो डिश रिचार्ज करना होगा,” पीछे से भौजी की मजाकिया आवाज़ आई। रिचार्ज करके रिमोट से चैनल 809 पर ट्यून किया, जहां शाहिद कपूर मस्ती में हाईवे पर रॉयल एनफील्ड दौड़ाContinue reading “घर की गलियों में कॉलेज”

रामचनर काका 3.O: आधुनिकता का अत्याचार

माननीय मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल जी के पिछले दो कार्यकालों से प्रभावित होकर दिल्ली की जनता विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल 3.O का स्वागत  कर रही है ऐसे में हम अपने पाठकों की मांग पर लेकर आ रहे हैं रामचनर काका 3.O, रामचनर काका की दिलचस्प बातों की इस श्रृंखला में आगे पढ़ते हैं आधुनिकताContinue reading “रामचनर काका 3.O: आधुनिकता का अत्याचार”

चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ

मेरे पुराने घर के वेंटिलेटर पर,हमेशा ही गौरैयों का घोसला लगा रहता।रोज शाम को ठीक चार बजे,वे नीचे उतर कर खिड़की पर बैठ जातीं,मेरे इंतज़ार में। गांव के सरकारी स्कूल की पीछे की दीवार को फांदकर,अपना बस्ता लेकर भागता हुआ,घर की दीवारों, दरवाज़ों से टकराते हुए,आखिरी कमरे तक पहुँचता,जहां पर पहले से ही मेरी माँContinue reading “चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ”

इतवार की बेचैनी

ये इतवार भी क्या गजब ढा गया,सुबह झटके में नींद खुली,जब सपने में तुम्हें किसी और का होते देखा।नींद उड़ी, वह अलग बात,दिन का चैन छीना,दिल को बेचैन किया।नहीं खबर मुझे कि हो क्या रहा,मनोदशा बिगड़ गई तब।अचानक से आसपास के लोग,अनचाही भीड़ लगने लगे।जिनके बीच खड़ा तो था पर,कोई समझ न पाया इस बेचैनीContinue reading “इतवार की बेचैनी”

तकिये तले खत

अब चुकि बादलों में छुप रहा आज का चाँद है,खामोशी की तलाश में गुजर रही ये रात है।अजीब सी बेचैनी हो रही है मन में,सोच रहा हूँ, एक और खत लिख दूँ तुम्हारी याद में।रख लूं तकिये के नीचे,कहीं इसी बहाने तुम ख्वाब में आ जाओ,इक मुलाकात हो जाए,और शायद हमारी बात हो जाए।

बैगनी यादें

हाँ, बाहर बारिश हो रही है,इतेफाक से उसके शहर से गुजरती है यह ट्रेन,जिसमें मैं सफर कर रहा हूँ,और पढ़ रहा हूँ उसकी पसंदीदा किताब,जिसे आखिरी मुलाकात में वो इरादतन छोड़ गई थी।यादें एक साथ चोट कर रही हैं,जब-जब चिन्हित शब्दों को मेरी निगाहें पार कर रही हैं।महसूस कर रहा हूँ उसकी उंगलियों की छुअनContinue reading “बैगनी यादें”

गोलघर की गलियों में

सुनो, कुछ मीठा खा लो, सब ठीक हो जाएगा। वैसे, अभी कहाँ हो? अरे, इधर पटना में गोलघर के पास फंसे हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करें… हताशा सा महसूस हो रहा है, पता नहीं क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि बदनसीबी मेरे हिस्से की जायदाद में किसी ने लिख दी है। अरे लल्ला,Continue reading “गोलघर की गलियों में”