चुप्पी के बीच में

कॉलेज के आखिरी साल की बात है—शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक मेट्रो से जा रहे थे हम। हम क्यों? हम इसलिए कि हम तीन थे: मैं, तुम, और तुम्हारी सहेली। यह अलग बात है कि हम तीनों साथ में मेट्रो में नहीं बैठे थे—वैसा संयोग ही नहीं बना कभी। तुम अपनी सहेलीContinue reading “चुप्पी के बीच में”

पीपल का पेड़

हर पीपल का पेड़ मुझेमेरे गाँव की याद दिलाता है,मैं बैठ जाना चाहता हूँउसके नीचे बस थोड़ी देर के लिए,इस आस में कि वो छाँव जो मुझेखेतों में भागने के बाद,घर लौटने के क्रम मेंवक़्त से वक़्त चुराकरबैठने पर मिलती थी। वो छाँव जो मुझेमेरे गाँव के इकलौते मित्रके साथ उसके आम के बगीचों में,पकते-महकतेContinue reading “पीपल का पेड़”

तुम्हारी कविताओं में

आजकल जल्दी सो जाता हूँ,लेकिन आज मन कुछ भारी सा है।अचानक यादें तुम्हारी मजबूर कर रही हैं,कि पढ़ूँ थोड़ा-बहुत तुम्हें समर्पित पुरानी कविताओं को।एक-एक करके कितनी ही कविताएँ पलट दी,मन और व्याकुल हो चला,तुमसे मिलने को आतुर हो चला। पर आजकल तुमसे दूर जाने की ठान रखी है,जो पहली दफा नहीं है।हर दफा खुद सेContinue reading “तुम्हारी कविताओं में”

बचपन की पगडंडियाँ

सुनो, चार साल हो गए ना—कुछ और दिन में हमारी विदाई होगी।विदाई, समझती हो ना?अरे वही, जो मिलने के बाद होता है।पर हम तो कभी मिले ही नहीं—फिर विदाई कैसी? अरे, लेखक को चाँद से भी तो मिलना है,गाँव के सबसे लंबे पेड़ से,छिपते चाँद को भी तो देखना है।अब जाते जाते इस शहर में,दुबाराContinue reading “बचपन की पगडंडियाँ”

एक साल बाद की मुस्कान

किसको लिखें और क्या लिखें?तुमको लिखें तो क्या लिखें?सवाल लिखें या इज़हार लिखें?या फिर पूरे एक साल बाद जो देखी,वो खूबसूरत मुस्कान लिखें? इत्तेफ़ाक का दौर अब पुराना हो चला,अगले दिन मिलोगी ये सपने में देखा बीती रात ही। जमाना हो गया, पर बदला कुछ नहीं,देख कर तुम्हें दिल की धड़कन बेकाबू रही आज भी।झलकContinue reading “एक साल बाद की मुस्कान”

लेखक-वेखक

मैं कोई लेखक-वेखक नहीं हूँ, मुझे इश्क़ हुआ तुमसे, और फिर कहानियां बुनते गया। शब्दों को कविताओं की माला में पिरोते गया, शायरियाँ बनती रहीं, तुम्हारे नखरे और चहचहाहट पन्नों पर उतरने लगे, तालियाँ बजती रहीं। अब महफिल जब खत्म होने को है, तीन-चार साल का ये अविस्मरणीय दौर खत्म होने को है, सबको लगContinue reading “लेखक-वेखक”

माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता

किसी से वादा तो कविता नहीं लिखने का किया था न, कुछ और तो लिख ही सकते हैं। बात कुछ ऐसी है कि अब इस अकेलेपन में, जब चारों तरफ त्यौहारों की चर्चा हो रही है और हम एक बार फिर ऐन मौके पर घर से दूर रहने का फैसला ले चुके हैं, तो इसContinue reading “माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता”

हम बेवक्त हो चले

कुछ दिन पहले जब पूर्णिमा की रात थी,छत पर बैठकर चाँद की रौशनी में नहाया,अपने गांव को देख रहा था।कल्पना कर रहा था कि तुम छत के दूसरे कोने में खड़ी हो,और आसमान में एकटक देख रही हो,मानसून में भी बिन बादल के चाँद देख रही हो,जिसके प्रभाव से दूधिया रौशनी तुम्हारे चेहरे पर चमकContinue reading “हम बेवक्त हो चले”

गांव के पीछे चंवर

दिन रात लैपटॉप पर बैठे रहते हो, आँखों पर असर नहीं होता क्या बउवा?माँ की चिंताजनक बातों का असर था कि बारिश के बाद की ताजी हवा लेने मैं छत पर चढ़ गयानज़ारा देख मेरी आंखें चमक उठींआज तक कभी खेतों में जमे पानी में ऐसा नजारा नहीं देखा थादूर-दूर तक कोई किनारा नहीं दिखContinue reading “गांव के पीछे चंवर”