हाँ, बाहर बारिश हो रही है,इतेफाक से उसके शहर से गुजरती है यह ट्रेन,जिसमें मैं सफर कर रहा हूँ,और पढ़ रहा हूँ उसकी पसंदीदा किताब,जिसे आखिरी मुलाकात में वो इरादतन छोड़ गई थी।यादें एक साथ चोट कर रही हैं,जब-जब चिन्हित शब्दों को मेरी निगाहें पार कर रही हैं।महसूस कर रहा हूँ उसकी उंगलियों की छुअनContinue reading “बैगनी यादें”
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गोलघर की गलियों में
सुनो, कुछ मीठा खा लो, सब ठीक हो जाएगा। वैसे, अभी कहाँ हो? अरे, इधर पटना में गोलघर के पास फंसे हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करें… हताशा सा महसूस हो रहा है, पता नहीं क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि बदनसीबी मेरे हिस्से की जायदाद में किसी ने लिख दी है। अरे लल्ला,Continue reading “गोलघर की गलियों में”
रामचनर काका 2.O
हॉस्टल में बिजली नहीं है पिछले चौबीस घंटों से सिर्फ़ उतनी ही बिजली आई है जितना मेरे गांव में आया करती है दो से चार घंटे की बिजली वह भी बड़ी मुश्किल से। पिछले चौबीस घंटे एक ऐसा अनुभव दे गए जो कई मायने में महत्त्वपूर्ण है। एक अनुभव कहता है कि इतनी भीषण गर्मीContinue reading “रामचनर काका 2.O”
लोकसभा चुनाव वाया गाँव || रामचनर काका 1.O
3:40 AM,अरे नहीं आज इतनी देर तक जाग नहीं रहा,अभी सो कर उठा हूँ। पिछले कुछ दिनों से अपने गाँव आया हूँ तो यहाँ जल्दी सोना और सोकर उठ जाना आम बात है। अभी अचानक बचपन की वो बात याद आ गयी जब पिताजी,बाबा को बोलकर सुबह चार बजे भोर में उठाकर अंग्रेजी के बीसContinue reading “लोकसभा चुनाव वाया गाँव || रामचनर काका 1.O”
छठ पर्व || दादी || घर || कॉलेज
गुजर गए दिन हफ्ते,साल और यहाँ तक की पूरा एक दशकघर जाने के इंतज़ार मेंजहां हर इक दुपहरी सिर्फ बातों में जाया करते थेआज सिमट गई है दो ढाई मिनट की बात मेंजिसके गोद में सोया करता था मैंएक ही सवाल करती थी वो हर बार‘अबकी जो जा रहे हो फिर कब आवोगे’वो भी गुजरContinue reading “छठ पर्व || दादी || घर || कॉलेज”
झूठ का सच्चा स्वरूप: विज्ञापन
विज्ञापन बाज़ार निर्माण का अभिन्न घटक है। विज्ञापन का मूल तत्व यह माना जाता है कि जिस वस्तु का विज्ञापन किया जा रहा है उसे लोग पहचान जाएँ और उसको अपना लें। परन्तु आजकल के विज्ञापन का इस्तेमाल अपने को दूसरे से बेहतर दिखाने के लिए किया जाने लगा है। जब भी मेरा ध्यान इसकेContinue reading “झूठ का सच्चा स्वरूप: विज्ञापन”
श्रीदेवी : एक ख़त आपके नाम
आपकी कुछ फिल्में थी जो बचाकर रखना चाहता था। सोचा था इनको जिंदगी के उन लम्हों में देखूंगा जब कुछ और करने को न बचा हो।लेकिन आपका यूं असमय चले जाना एक सदमा है। ख़ैर, ये लम्हें, ये पल हम बरसों याद करेंगे… “वैसे मैं वीरेन बाबू तो हूं नहीं जो आप मेरे लिए दूसराContinue reading “श्रीदेवी : एक ख़त आपके नाम”
एक ख़त जोनास चोपड़ा जी के नाम
अप्रिय जोनास चोपड़ा जी, आपको ये जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि हर बार की भांति इसबार भी हमारा सेमेस्टर पता नहीं कैसे गुजर गया।इन बातों से जो सम्बन्ध आपका है बिलकुल वैसा ही हाल मेरा रहा है आपके धुआंधार सम्पन्न हुई शादी को लेकर| धुआंधार से याद आया हमने दिवाली में पटाखे कम फोड़े थे,Continue reading “एक ख़त जोनास चोपड़ा जी के नाम”
इश़्क-ए-दिल्ली
सुब के 8 बज रहें हैं और आप सुन रहे हैं देश की सुरीली धड़कन, विविध भारती! आइये सुनते हैं फिल्म ‘फ़िर कब मिलोगी’ से मज़रूह सुल्तान पुरी का लिखा ये गीत जिसे संगीत दिया है राहुलदेव वर्मन ने और आवाज दी है मुकेश और लता ने | “कहीं करती होगी,वो मेरा,इन्तज़ार, जिसकी तमन्ना में,Continue reading “इश़्क-ए-दिल्ली”
अन्तर्दद्व
आखिर बात क्या है? मुझे हुआ क्या है? पहले तो ऐसा नहीं था।मैं बचपन से छात्रावास में रह हूं लेकिन अब यहाँ रहने में घुटन क्यों महसूस हो रही है। क्यों आजकल कोई भी चेहरा वास्तविक नहीं लगता? क्यों हर चेहरा पर एक अजीब तरह का मुखौटा होने का आभास होता है,जो बीते कल औरContinue reading “अन्तर्दद्व”