रामचनर काका 4.O: आधुनिकता का आँगन और हैंडपंप का ठंडा पानी

4:47 AM, गांव की हवा वैसी ही है, पर कुछ बदली-बदली सी। पिछली बार जब यहां आया था, तब दिल्ली से बेंगलुरु शिफ्ट हुआ था। अब कॉरपोरेट की चकाचौंध में पूरा डूब चुका हूँ। काका ने हमेशा कहा था, “शहर चाहे जितनी तेज़ी से भागे, गांव की मिट्टी कभी छूटने नहीं देगी।” लेकिन ये हैंडपंपContinue reading “रामचनर काका 4.O: आधुनिकता का आँगन और हैंडपंप का ठंडा पानी”

अटकी सुई का सफर

मैं लिखना चाहता हूँ, मेरे मिलने-जुलने वाले लोग चाहते हैं कि मैं लिखूं, तो फिर मैं लिखता क्यों नहीं? मेरी सुई कहां अटक जाती है आखिरकार? चलिए आज सिर्फ वही लिखते हैं कि मेरी सुई कहां अटकती है! मैंने जो लिखा है वो बस तीन चीजों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आई हैं: चाँद, गांव औरContinue reading “अटकी सुई का सफर”

चुप्पी के बीच में

कॉलेज के आखिरी साल की बात है—शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक मेट्रो से जा रहे थे हम। हम क्यों? हम इसलिए कि हम तीन थे: मैं, तुम, और तुम्हारी सहेली। यह अलग बात है कि हम तीनों साथ में मेट्रो में नहीं बैठे थे—वैसा संयोग ही नहीं बना कभी। तुम अपनी सहेलीContinue reading “चुप्पी के बीच में”

Math Music Mentor

Growing up in a hostel away from home and loved ones was a lonely experience for me. But music, especially Kishore Kumar’s songs, was always there to comfort me. Listening to the radio on Vividh Bharti was a daily routine in our hostel, and I would eagerly wait for my favourite songs to play. OneContinue reading “Math Music Mentor”

पीपल का पेड़

हर पीपल का पेड़ मुझेमेरे गाँव की याद दिलाता है,मैं बैठ जाना चाहता हूँउसके नीचे बस थोड़ी देर के लिए,इस आस में कि वो छाँव जो मुझेखेतों में भागने के बाद,घर लौटने के क्रम मेंवक़्त से वक़्त चुराकरबैठने पर मिलती थी। वो छाँव जो मुझेमेरे गाँव के इकलौते मित्रके साथ उसके आम के बगीचों में,पकते-महकतेContinue reading “पीपल का पेड़”

तुम्हारी कविताओं में

आजकल जल्दी सो जाता हूँ,लेकिन आज मन कुछ भारी सा है।अचानक यादें तुम्हारी मजबूर कर रही हैं,कि पढ़ूँ थोड़ा-बहुत तुम्हें समर्पित पुरानी कविताओं को।एक-एक करके कितनी ही कविताएँ पलट दी,मन और व्याकुल हो चला,तुमसे मिलने को आतुर हो चला। पर आजकल तुमसे दूर जाने की ठान रखी है,जो पहली दफा नहीं है।हर दफा खुद सेContinue reading “तुम्हारी कविताओं में”

खिड़की से झांकते त्योहार

कोई भी त्योहार हो, आप एक बार जरूर सोचते हैं कि पिछली बार आज के दिन क्या किया था। फिर एक के पीछे दूसरी याद आती जाती है, और एक कड़ी बन जाती है यादों की, जिससे आप बहुत सारी यादों के साथ बाहर आते हैं। आप उनमें से चुनते हैं कि कौन-सा पल सबसेContinue reading “खिड़की से झांकते त्योहार”

बचपन की पगडंडियाँ

सुनो, चार साल हो गए ना—कुछ और दिन में हमारी विदाई होगी।विदाई, समझती हो ना?अरे वही, जो मिलने के बाद होता है।पर हम तो कभी मिले ही नहीं—फिर विदाई कैसी? अरे, लेखक को चाँद से भी तो मिलना है,गाँव के सबसे लंबे पेड़ से,छिपते चाँद को भी तो देखना है।अब जाते जाते इस शहर में,दुबाराContinue reading “बचपन की पगडंडियाँ”