रामचनर काका 4.O: आधुनिकता का आँगन और हैंडपंप का ठंडा पानी

4:47 AM, गांव की हवा वैसी ही है, पर कुछ बदली-बदली सी। पिछली बार जब यहां आया था, तब दिल्ली से बेंगलुरु शिफ्ट हुआ था। अब कॉरपोरेट की चकाचौंध में पूरा डूब चुका हूँ। काका ने हमेशा कहा था, “शहर चाहे जितनी तेज़ी से भागे, गांव की मिट्टी कभी छूटने नहीं देगी।” लेकिन ये हैंडपंप का ठंडा पानी, धान के खेत और वो मिट्टी की सुगंध अब सिर्फ यादों में ही आती है। सुबह की ठंडी हवा, खेतों में रोपनी का काम और मैं, वही पुराना लड़का, जो अपनी मिट्टी से कुछ दूर जा चुका है।

“अरे तनी इधर आओ, देखो तो कौन आया है!”

काका की वही पुरानी आवाज़, वही काका, बस अब उनके हाथ में स्मार्टफोन और चेहरे पर चश्मा।

“प्रणाम काका!”

“जीते रहो बेटा, बेंगलुरु के बड़े लोगन में अब पहचान बन गई होगी?”

काका की वही पुरानी चुटकियां। पहले कॉलेज की अनियमित उपस्थिति को लेकर छेड़ते थे, अब गाँव की अनियमित विज़िट पर।

“हाँ काका, अब वो बात नहीं रही। दिल्ली से गाँव का सफर सोलह घंटे में हो जाता था, अब बेंगलुरु से आना तो एक प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की तरह हो गया है। कभी-कभी सोचता हूँ कि विकास के नाम पर हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं।”

काका ने गंभीर होकर जवाब दिया, “देखो बेटा, मैंने पहले ही कहा था, ये आधुनिकता तुम्हें अपनों से दूर ले जाएगी। अब देखो, तुम्हारे पिताजी को वीडियो कॉल में ही तसल्ली मिलती है।”

मैं चुप हो गया। वो सही कह रहे थे। ‘वर्क फ्रॉम होम’ का मतलब भले ही डिजिटल आजादी हो, लेकिन असली घर आने के लिए छुट्टियों का इंतजार ही करना पड़ता है।

“और तुम्हारे बाकी दोस्तन का क्या हाल है? अब तो वो अमेरिका में होंगे या फिर यूरोप की धूप सेंक रहे होंगे।”

काका की बात पर मैं मुस्कुरा दिया। हां, कुछ अमेरिका चले गए, कुछ यूरोप में जॉब कर रहे हैं। जो यहीं रह गए, वो देश की सेवा में हैं या फिर मेरे जैसे कॉरपोरेट में अटके हैं।

काका ने अपना स्मार्टफोन जेब में डाला और बोले, “देखा करते थे न तुम लोग मेरा मज़ाक, जब मैं कहता था कि ये फोन, टीवी, ये सब तुम्हें अपनों से दूर कर देगा। अब देख लो, फोन से जुड़ाव है, पर दिल से दूरी भी। पर मैं आज भी उसी पुराने रेडियो का दीवाना हूँ। ये स्मार्टफोन तो बस तुमसे बात करने का जरिया है।”

उनकी बातों में वही सादगी और गहराई थी। ये काका थे, जो कभी बिजली का विरोध करते थे और अब स्मार्टफोन चला रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं उनका मन अभी भी उसी बरगद के नीचे, उसी चौपाल में बसा है।

तभी मेरे फोन की घंटी बजी—ऑफिस का ईमेल। बेंगलुरु में सुबह एक जरूरी मीटिंग थी, और मुझे तैयारियां करनी थीं। काका समझ गए। “जाओ बेटा, बड़े आदमी हो गए हो अब। पर याद रखना, जड़ें जितनी मजबूत होती हैं, पेड़ उतना ही ऊँचा बढ़ता है।”

मैं मुस्कुरा दिया, और कुछ सोच में डूब गया। शहर से शहर, नौकरी से नौकरी, लेकिन कहीं न कहीं गांव की ये जड़ें हमेशा मेरा आधार रही हैं।

शाम की फ्लाइट थी। आखिरी बार हैंडपंप से नहाया। ठंडा पानी और बचपन की वो स्मृतियां एक बार फिर ताज़ा हो गईं। धान के खेतों में थोड़ी देर टहला। काका से विदा ली, और सोचने लगा कि अगली बार कब आ पाऊंगा। कॉरपोरेट की दौड़ में कहीं खुद को खो रहा हूं, या शायद ये भी एक तरह का विकास है। इस सवाल का जवाब शायद अगली बार काका से मिलकर मिल ही जाएगा।

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