अटकी सुई का सफर

मैं लिखना चाहता हूँ, मेरे मिलने-जुलने वाले लोग चाहते हैं कि मैं लिखूं, तो फिर मैं लिखता क्यों नहीं? मेरी सुई कहां अटक जाती है आखिरकार? चलिए आज सिर्फ वही लिखते हैं कि मेरी सुई कहां अटकती है! मैंने जो लिखा है वो बस तीन चीजों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आई हैं: चाँद, गांव और कॉलेज! ऐसा समझिए कि जो क्रम है शब्दों का उसकी वही प्राथमिकता रही है मेरी लेखनी में…

ऐसा नहीं है कि मैंने बस छोड़ दिया है सोचना लिखने के तरीके से, मैं अब भी वैसे ही आत्ममंथन करता हूँ किसी चीज को लेकर जिसके बारे में लिख सकूं लेकिन सुई अटक जाती है चाँद पर। मनोदशा कुछ ऐसी हो जाती है जैसे ये शब्द याद आते ही हाथ/कलम रुक सी जाती है, उसके आगे नहीं लिखा या सोचा जाता। अभी भी हुआ पर आज कुछ अलग लग रहा है, पिछले कुछ दिनों से अब अलग लग रहा है…लोगों ने खूब चाहा कि मैं चाँद से आगे बढ़ूं, जिंदगी और भी है…मैंने भी चाहा पर कुछ ऐसे भंवर में फंसा रहा जहां लगता था मैं अब बँध गया हूँ उससे किसी अटूट डोर से। वो अटूट डोर अब वक्त के साथ फंदा लगने लगा था जब मैं लोगों को समझा नहीं पा रहा था कि ये अटूट क्यों है, जब एक छोर मेरे ही हाथ में है तो क्यों इसे फंदा समझ रहा हूँ मैं?

तब एहसास हुआ कि ये डोर सिर्फ मैंने ही पकड़ा है, अगर मैं छोड़ दूं तो दूसरा छोर दिखेगा भी नहीं। क्यों बेवजह इसे मजबूत किए जा रहा हूँ…एक वजह और रही है इस डोर के अब तक मेरे छोर से जकड़े रहने की वो है जब भी मैंने पकड़ ढीली करने की कोशिश की है, मुझे मेरे सपनों ने परेशान किया है मतलब मैं जागते हुए तो परेशान था ही, नींद में भी चाँद के सपने आते थे और आते हैं। पिछले कई दिनों में जो डोर पर से पकड़ ढीली की थी वो थोड़ी सी आज मजबूत फिर से हो जाती अगर आज उठने के साथ मैं ये न सोचता कि मेरा इस डोर से कोई लेना-देना नहीं है, वो आती रहे सपने में, मैंने तो अब सोचना भी बंद कर दिया है फिर आज के सपने का कोई मतलब नहीं बनता, डोर तो मुझे ही छोड़नी है।

फिर अब जिक्र आता है गांव का जो पिछले तीन साल में बस दो बार जाना हो पाया है, यूं कहें कि जब से नौकरी लगी है गांव आना जाना बंद हो गया है। गांव के जो काल्पनिक पात्र थे उनसे मिलना-जुलना नहीं हो पाता है अब, जो अक्सर गांव जाते वक्त कुछ लोग दिखते थे ट्रेन में, बस में या फिर स्टेशन पर बैठे लोगों में, गांव के बाजार में या फिर मेरे अपने गांव में जिनसे प्रेरित होकर मैं उनके एक पात्र बना देता था, अब नहीं देख पाता। मैं अपने खेत, कैसी दिख रही उसमें फसल…धान है कि गेहूं, ये सब बस सोच पाता हूँ। फिल्में ऐसी देखने लगा हूँ जो ऐसी भावनाओं से भरी हों जहां इंसान घर/गांव वापस जाता है, जाना चाहता है…पर उसका भी अंत मेरे जैसे ही होता है कि वो भी वापस नहीं जा पाता है!

अब बचा तीसरा जो कि कॉलेज है, अब आप ही सोचिए कोई उम्र भर कॉलेज में थोड़ी रह सकता है, कॉलेज से बँधे रहना उसके बारे में लिखना बहुत निराश करती है। हाँ, थोड़ी बहुत खुशी देती है बीते पलों को याद करने पर लेकिन फिर उसके साथ मुफ्त में मिलती है उदासी जो दोस्तों के बगैर अकेले कमरे में बैठे ढोया नहीं जाएगा। आज मैं लिखने और मन में दबी बातों को बाहर निकालने का एक जरिया ढूंढ रहा हूँ, बिना इसे किसी से जोड़े लिख रहा हूँ क्योंकि हर बार बस इसलिए यहां नहीं लिखता था कि लोग मेरे लिखने से बस एक इंसान को जोड़ देते हैं और मेरा लिखना व्यर्थ हो जाता है। उम्मीद करते हैं आप भी मुझे वो डोर जो अटूट लग रही थी उसे ढीली करने में मेरी मदद करेंगे और वक्त के साथ याद दिलाते रहेंगे कि वो डोर सिर्फ मैंने पकड़ी है…बाकी सोच तो इस बार ऐसा है कि कम से कम महीने में एक बार यहां मुलाकात होगी जरूर…कुछ नया लिखा तो ठीक वरना पुराने लेकिन ताज़े लेखनी के साथ!

One thought on “अटकी सुई का सफर

Leave a comment