चुप्पी के बीच में

कॉलेज के आखिरी साल की बात है—शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक मेट्रो से जा रहे थे हम। हम क्यों? हम इसलिए कि हम तीन थे: मैं, तुम, और तुम्हारी सहेली। यह अलग बात है कि हम तीनों साथ में मेट्रो में नहीं बैठे थे—वैसा संयोग ही नहीं बना कभी। तुम अपनी सहेली के साथ कोच के दूसरे कोने में बैठी थी, और फुसफुसाहट चल रही थी तुम दोनों के बीच… ऐसा आभास हो रहा था कि मेरी बातें हो रही हैं क्योंकि एक वक्त के बाद तुम दोनों का मेरी तरफ देखना मुझे असहज महसूस करा रहा था। इसके बाद हम लोग कब अपने गंतव्य तक पहुंचे, इसका पता नहीं चला। लेकिन वहाँ पहुँचने के बाद मैं अकेले बैठा था।

गंतव्य कुछ ऐसा था कि एक बड़ा सा ग्राउंड था, उसके बीचो-बीच एक कृत्रिम झरना था जिसके इर्द-गिर्द कई अनजान चेहरे चहलकदमी कर रहे थे। मैं झरने के एक किनारे पानी में पैर लटकाकर बैठा था, शून्य में खोया हुआ। तभी तुम्हारी सहेली आई और पूछने लगी कि क्यों अकेले यहाँ बैठा हूँ, क्या सोच रहा हूँ? कहीं कोई नई कविता तो नहीं गढ़ रहा? मैं तब भी चुप रहा… जैसे बोलना तो मुझे आता ही नहीं। फिर तुम भी पास आ गई थी, उस झरने के दूसरे छोर पर।

“पता नहीं क्यों तुम बोलते ही नहीं हो,” तुम्हारी सहेली ने कहा, जिसे सुनकर मेरा मंद-मंद मुस्कुराना उसके लिए संकेत था कि अब मैं ठीक हूँ।
“चलो अब मिजाज हल्का हो गया हो तो एक कविता सुना दो”… तुम्हारे सामने पहली दफा कुछ बोल पाया।
“अरे कौन सी सुननी है ये तो बताओ?”
“वो पहली कविता जो लिखी थी न तुमने.. अरे तुम तो देख रही थी न…वो सुना दो,” तुमने कहा।
तुम्हें बोलता देख, मुझसे बातें करता देख मैं घबरा जाता हूँ, घबराहट की वजह से नींद टूट जाती है मेरी… सुबह हो चली है। मुखड़े पर लाली लिए, मुस्कुराते, शर्माते अपनी डायरी खोलता हूँ और लिख लेता हूँ इस ख्वाब को भी, जिसमें पहले से लिखे जा चुके हैं कई ख्वाब—तुमसे मिलने के।

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