हर पीपल का पेड़ मुझे
मेरे गाँव की याद दिलाता है,
मैं बैठ जाना चाहता हूँ
उसके नीचे बस थोड़ी देर के लिए,
इस आस में कि
वो छाँव जो मुझे
खेतों में भागने के बाद,
घर लौटने के क्रम में
वक़्त से वक़्त चुराकर
बैठने पर मिलती थी।
वो छाँव जो मुझे
मेरे गाँव के इकलौते मित्र
के साथ उसके आम के बगीचों में,
पकते-महकते आमों के
टपकने के इंतज़ार में
घंटो खाट पर
बैठने पर मिलती थी।
पर अब हर पीपल सुना लगता है,
ना वो छाँव मिलती है,
ना वो मित्र मिलता है,
ना वो सुकून मिलता है।