तुम्हारी कविताओं में

आजकल जल्दी सो जाता हूँ,
लेकिन आज मन कुछ भारी सा है।
अचानक यादें तुम्हारी मजबूर कर रही हैं,
कि पढ़ूँ थोड़ा-बहुत तुम्हें समर्पित पुरानी कविताओं को।
एक-एक करके कितनी ही कविताएँ पलट दी,
मन और व्याकुल हो चला,
तुमसे मिलने को आतुर हो चला।

पर आजकल तुमसे दूर जाने की ठान रखी है,
जो पहली दफा नहीं है।
हर दफा खुद से हारकर,
नज़दीकी बढ़ाने की चाह रही है इस व्याकुल मन में,
हर बार हार जाने से मन कुंठित और पछतावा ही मिला।
फिर क्यों हारे मन इस बार?
अब ठाना है तो निभाना है।
फिलहाल तो शहर आ गए हैं तुम्हारे,
कम से कम एक बार मिलकर ही जाना है,
क्योंकि नींद गिरवी पड़ी है मेरी तुम्हारे पास,
उसे भी तो छुड़ाना है।

Leave a comment