कोई भी त्योहार हो, आप एक बार जरूर सोचते हैं कि पिछली बार आज के दिन क्या किया था। फिर एक के पीछे दूसरी याद आती जाती है, और एक कड़ी बन जाती है यादों की, जिससे आप बहुत सारी यादों के साथ बाहर आते हैं। आप उनमें से चुनते हैं कि कौन-सा पल सबसे अच्छा था, और फिर अगले कुछ पल आप उस विशेष त्योहार के वर्ष में होनेवाली अन्य घटित घटनाओं के बारे में सोचने लगते हैं।
आज सुबह उठा तो ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ। रविवार होने के बावजूद जल्दी उठ गया, कॉलेज में दोपहर तक सोने वाली आदत अब बहुत दूर जा चुकी है, क्योंकि अब चार बजे भी सोकर सात बजे से पहले उठ जाना आम बात है। खैर, सुबह उठते ही कानों में देशभक्ति गीत पड़ते ही समझ आ गया कि आज विशेष दिन है। चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ दिन की शुरुआत हुई, पर नहाने-खाने के दौरान मेरा दिमाग स्वतंत्रता दिवस की सबसे पहली याद को खंगालने लगा और जा अटका 1999 की कारगिल युद्ध के दौरान की हल्की फुल्की यादें पर। जब फाइटर जहाज कुछ ज्यादा ही दिखते थे आसमान में और मेरे बाबा न्यूज़पेपर लेने की खातिर मुझसे अपना बटुवा लाने को बोल रहे थे और मैं सौ ग्राम जलेबी की खातिर दो रुपये अतिरिक्त निकलने की ज़िद कर रहा था।
कुछ यादें हैं प्राथमिक स्कूल वाले दोस्तों के साथ की, जब सुबह बिना कुछ खाये-पिये सफेद लिबास में हाथों में खुद का बनाया तिरंगा लेकर प्रभातफेरी करने निकलते थे। देशभक्ति नारों की उद्घोषणा से पूरे गाँव में एक अलग जोश दिखाई देता था। प्रभातफेरी जिसके घर के सामने से गुजरती, उसके घरवाले तो गर्व से देखते अपने बच्चों को देशभक्ति लिबास में, लेकिन हम बच्चे थोड़ा शरमा जाते, थोड़ा सचेत हो जाते कि इज्जत की बात है, कोई गलत हरकत न हो जाये, मजाक न उड़ जाए। ऐसा लगता जैसे राजपथ वाली परेड है और पूरी दुनिया की नजर हम पर। फिर वही जलेबी, बुनिया, बताशा और लड्डू या फिर आप प्राइवेट स्कूल वाले हैं तो आपको समोसे मिलेंगे।
ये एक बेहतरीन तरीका है हर साल ज़िंदगी में आए त्योहारों को एक साथ जी लेने का। बाकी हम भी स्पीकर पर बजा रहे हैं, “नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ, बोलो मेरे संग जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद!”