बचपन की पगडंडियाँ

सुनो, चार साल हो गए ना—
कुछ और दिन में हमारी विदाई होगी।
विदाई, समझती हो ना?
अरे वही, जो मिलने के बाद होता है।
पर हम तो कभी मिले ही नहीं—
फिर विदाई कैसी?

अरे, लेखक को चाँद से भी तो मिलना है,
गाँव के सबसे लंबे पेड़ से,
छिपते चाँद को भी तो देखना है।
अब जाते जाते इस शहर में,
दुबारा किसी दिन आने और
बीते किस्सों को दुबारा जीने
का ख्वाब छोड़ जाता हूँ।

अभी तो जाएंगे घर,
दो-चार सूटकेस लिए हाथ में,
और मिलेंगे अपने खेतों से, खलिहानों से,
मिलेंगे उन कच्ची पगडंडियों से,
जिनमें भाग-दौड़ में बचपन गुजरी है,
मिलेंगे उन पगडंडियों के किनारे लगे
लीची-आम के बगीचों से…

एक मलाल लिए मन में
कि तुमसे कभी मिल न सके।
सुनो! अभी तुम उदास न होना,
हम आएंगे किसी रोज़… ख्वाब में,
क्योंकि लेखक को चाँद से भी तो मिलना है।

Leave a comment