लेखक-वेखक

मैं कोई लेखक-वेखक नहीं हूँ,
मुझे इश्क़ हुआ तुमसे,
और फिर कहानियां बुनते गया।
शब्दों को कविताओं की माला में पिरोते गया,
शायरियाँ बनती रहीं,
तुम्हारे नखरे और चहचहाहट
पन्नों पर उतरने लगे,
तालियाँ बजती रहीं।
अब महफिल जब खत्म होने को है,
तीन-चार साल का ये
अविस्मरणीय दौर खत्म होने को है,
सबको लग रहा है कि मैं एक लेखक हूँ,
पर मुझे लगता है कि
सिर्फ इश्क़ हुआ है
और साथ ही मैं शब्दों का सहेजक हूँ।

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