माँ और मैं: एक अनसुलझा रिश्ता

किसी से वादा तो कविता नहीं लिखने का किया था न, कुछ और तो लिख ही सकते हैं। बात कुछ ऐसी है कि अब इस अकेलेपन में, जब चारों तरफ त्यौहारों की चर्चा हो रही है और हम एक बार फिर ऐन मौके पर घर से दूर रहने का फैसला ले चुके हैं, तो इस अकेलेपन का एक ही सहारा बचा है मेरे पास, वो है कुछ न कुछ लिखते रहने का। अब चूँकि चाँद की बातें पढ़कर लोग ऊबने लगे हैं और माशूका से हटकर माँ को समर्पित लेखों की मांग कर रहे हैं, तो सवाल यह है कि मैं ‘माँ के लिए क्यों नहीं लिखता?’ ध्यान रहे ये लिखने भर की बातें हो रही हैं, ऐसा नहीं है कि मैं माँ के ख्यालों में नहीं उलझता। यह एक ऐसी उलझन है जिसे मैं सुलझने नहीं देना चाहता। बचपन से माँ से दूर रहने के कारण माँ को क्यों याद करें, वाले ख्याल हमेशा आते हैं, न कि माँ की बातें। जो भी बचपन घर में गुजरा, बाबा के करीब गुजरा, जो वक़्त बाबा से बच जाता, वो दादी के हिस्से जाता, इसके बाद भी अगर कुछ वक़्त बचा हो घड़ी में, तो वो पिताजी के सामने बैठकर अंग्रेजी के शब्दों को रट्टा मारने में खर्च हो जाता था। माँ को क्या मिलता, न माँ को माँ मिलती, न माँ को मैं मिलता। उसे तो बस सिलाई से मतलब होता, सिलाई से फुरसत मिलती तो सबके पसंद का खाना बनाती। अब इसमें माँ कहाँ बची मेरे खातिर। औरों की माँ को अपने लल्ले का लालन पालन करते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि ये सब भी होता है दुनिया में! मुझे तो बस चाँद की तरह माँ भी दूर से ही नज़र आती है। जैसे मुझे चाँद नहीं मिलने वाला है, वैसे ही शायद मुझे माँ भी नहीं मिलने वाली है।

माँ है तो सही पर दूर है… यहाँ से तो बस उसके सिलाई मशीन की खट-खट सुनाई देती है या फिर उसके हाथों से बने लकड़ी के चूल्हे पर पका खाना ही याद आता है।

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