कुछ दिन पहले जब पूर्णिमा की रात थी,
छत पर बैठकर चाँद की रौशनी में नहाया,
अपने गांव को देख रहा था।
कल्पना कर रहा था कि तुम छत के दूसरे कोने में खड़ी हो,
और आसमान में एकटक देख रही हो,
मानसून में भी बिन बादल के चाँद देख रही हो,
जिसके प्रभाव से दूधिया रौशनी तुम्हारे चेहरे पर चमक रही है।
आँखें तो दिख नहीं रहीं, फिर भी एक आश्चर्य वाली चमक दमक रही है,
तुम्हारे कानों की बाली चमक रही है,
सर के पीछे बंधे जुड़े से आजाद होकर लटें आगे गालों पर लटक रही हैं,
लटों को कानों के पीछे सजा रही हो,
जो दो हिस्सों में बाँट रहे थे तुम्हारे चेहरे को।
इसी दरम्यान चमक उठती है तुम्हारे कलाई में बंधी घड़ी,
वक्त का आभास होता है,
जैसे हम बेवक्त हो चले हो।
आँखें बंद करता हूँ, फिर खोलता हूँ,
पाता हूँ तुम वहाँ नहीं हो।
छत से उतरने का जी नहीं कर रहा,
अब तो सच में लग रहा है कि तुम इधर ही कहीं खड़ी हो।