दिन रात लैपटॉप पर बैठे रहते हो,
आँखों पर असर नहीं होता क्या बउवा?
माँ की चिंताजनक बातों का असर था
कि बारिश के बाद की
ताजी हवा लेने मैं छत पर चढ़ गया
नज़ारा देख मेरी आंखें चमक उठीं
आज तक कभी खेतों में जमे पानी में
ऐसा नजारा नहीं देखा था
दूर-दूर तक कोई किनारा नहीं दिख रहा था,
बस बीच-बीच में वही पुराने पेड़ खड़े थे
जो बाबा आदम के जमाने से हैं
जो रोशनी चारों ओर रोमांचित कर रही थी,
वह चाँद की परछाई थी
कई दिनों की मूसलाधार बारिश के बाद,
गांव के पीछे की चंवर
झील सी प्रतीत हो रही थी
पानी की सतह यूँ चहक रही थी,
जैसे पूर्णिमा की रात
कोई झील की सतह पर
चाँद को देखकर
किसी लेखक से लिपट जाती है,
उसकी शालीनता, उसकी प्रियतमा