घर की गलियों में कॉलेज

इन दिनों, सीढ़ियों से भागते हुए नीचे टेलीविजन वाले कमरे में पहुंचना मेरा आदतन काम बन गया है। “बबुआ, आज गाना सुनने के लिए तो डिश रिचार्ज करना होगा,” पीछे से भौजी की मजाकिया आवाज़ आई। रिचार्ज करके रिमोट से चैनल 809 पर ट्यून किया, जहां शाहिद कपूर मस्ती में हाईवे पर रॉयल एनफील्ड दौड़ा रहे थे। “बात दिल की नजरों ने की, सच कह रहा…” ये गीत सुनते ही कॉलेज की याद ताजा हो गई, जैसे मैक-मैक पर बैठे हुए हों, और कोई इसे स्पीकर पर बजा रहा हो, सबकी नजरें मुझ पर हों।

कितना कुछ बदल गया है—कभी घर पर वक्त बिताने को तड़पते थे, और अब घर में कैद महसूस कर रहे हैं। दिल्ली की जहरीली हवा में भी, खुलके सांस लेने का आनंद था। जब भी मन उचटता, कानों में इयरफ़ोन लगाकर OAT, स्पोर्ट्स ग्राउंड, इनर सर्कल, आउटर सर्कल, मैग्गी बाबा, TNP की छत जैसी कई जगहों पर जा पहुँचते थे। घर के खाने में अब होस्टल के खाने का स्वाद तलाश रहे हैं—वह खाना खराब तो था, पर उस संघर्ष वाली होस्टल जिंदगी में ही असली जिंदगी लगती थी। घर पर होते हुए भी, एक परिवार अभी भी अपने घर से दूर है। होस्टल की वो जिंदगी, जहां दिल्ली के लिए, हम सब अपने कैंपस के लिए गाए जा रहे हैं!

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