रामचनर काका 3.O: आधुनिकता का अत्याचार

माननीय मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल जी के पिछले दो कार्यकालों से प्रभावित होकर दिल्ली की जनता विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल 3.O का स्वागत  कर रही है ऐसे में हम अपने पाठकों की मांग पर लेकर आ रहे हैं रामचनर काका 3.O, रामचनर काका की दिलचस्प बातों की इस श्रृंखला में आगे पढ़ते हैं आधुनिकता का अत्याचार।

“विवेक जांगड़ा ने लगातार चार गेंदों पर चार विकेट झटक कर एक अलग कीर्तिमान स्थापित किया है – ऐसा लग रहा लसिथ मलिंगा आज डीटीयू के खेल मैदान में गेंदबाजी कर रहे हैं, जिनके समर्थन में समर्थक झूमते नज़र आ रहे हैं।”

हाल ही में संपन्न हुए वार्षिक खेल महोत्सव में एक क्रिकेट मैच की कमेंटरी का कुछ हिस्सा है जो हॉस्टल के कमरों में साफ़ सुनाई दे रहा था। ऐसी कमेंटरी सुनकर वो दिन याद आ गया जब रामचनर काका की मौजूदगी में पीपल के पेड़ के नीचे क्रिकेट में दिलचस्पी रखने और न रखने वाले लोग एक ही रेडियो से कान लगाकर देश-विदेश में हो रहे मैचों का सीधा प्रसारण सुनते थे। ये भीड़ क्रिकेट के अलावा देश-विदेश की ख़बरों को भी एक साथ ही सुनती थी जिसमें बीबीसी हिंदी से अंतर्राष्टीय, आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र से राष्‍ट्रीय तो वहीँ आकाशवाणी के पटना केंद्र से आने वाली स्थानीय ख़बरों का मिश्रण होता था।

आखिर की दो संस्थाओं से समाचार का प्रसारण पूर्ववत चलता रहेगा लेकिन पिछले 80 वर्षों से हिंदी समाचार सुनाने वाली बीबीसी हिंदी ने समाचार का प्रसारण बंद कर दिया। काका की जनता पर इसका असर पड़े या न पड़े लेकिन इसका अफसोस हर उस छात्र को होगा जो शहर से दूर रहकर भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी अन्य परीक्षाओं में आनेवाली करंट अफेयर्स की तैयारी बीबीसी के करंट अफेयर्स के एपिसोड में करता था। ऐसी परीक्षाओं में आने वाले निबंधों की तैयारी उस विशेष एपिसोड पर निर्भर करती था जिसमें विश्व के महत्त्वपूर्ण हिस्सों के किस्सों पर गहन चर्चे हुआ करते थे। अब तो सुबह साढ़े छह बजे का “ब्रिटिश काल” का “नमस्ते भारत” आजकल “अमेरिकी काल” में “नमस्ते ट्रम्प” ने ले लिया है तो वहीं शाम साढ़े सात पर आने वाली “दिन भर” को टेलीविजन चैनलों ने अपने तरीके से मत-प्रचार में समाहित कर लिया है, लोग मूर्ख बनाये जा रहे हैं अवास्तविक झूठे छल-प्रपंचो से भरे समाचारों के माध्यम से,आधुनिक तौर तरीकों से।

अब आधुनिकता से लड़ते-लड़ते मेरे रामचनर काका आधुनिकता के शरण में आ गए हैं जिसका उन्हें अंदाज़ा नहीं शायद। बात दरअसल ऐसी है कि पिछली छुट्टी में मैं जब गांव गया तो देखा काका स्मार्टफोन चला रहे हैं, मेरी पहली प्रतिक्रिया थी…काका ई कवन लाइन धर लिए आप? काका भौंहें चढ़ाकर तिरछी नज़रों से मेरी तरफ देखे तो पर बिना कुछ बोले वापस व्हाट्सएप में आये मेसेज को मात्रा में मात्रा मिलाकर पढ़ने लगे…

“हम उठ गए हैं जल्दी गुड मॉर्निंग बोल दो और हाँ लाइन से बोलना धक्का मुक्की नहीं करना”,

समझे बचवा इसके बाद देर तक काका मुझे बिठाकर एक-एक करके सारे फॉरवारडेड मेसेज को जबर्दस्ती सुनाने में लगे थे, अब चूंकि ठंड बहुत थी क्या करता चुपचाप सुनता रहा काका की अटकती हिंदी को, उस अलाव के सहारे। कोई बहाना बनाकर वहाँ से भागना भी थोड़ा अशिष्टाचार में गिना जाता…खैर काका इन फॉरवारडेड संदेशों को पढ़कर फूले नहीं समा रहे थे – वजह ये थी काका को इतना अपनापन वास्तविक ज़िन्दगी में कभी न मिला, इतनी भारी मात्रा में “राम-राम काका” थोड़े ही सुनने को मिलता है काका को। इक्के-दूक्के लोग ही बोलते हैं। बाकी जो चिंता की बात थी वो ये थी कि काका का जितना वक़्त समाज सुधारक बयानों में ज़ाया होता था उससे कहीं ज्यादा अब स्मार्टफोन में हो रहा है। वैसे ये वक़्त तो काका के लिए रेडियो पर समाचार सुनने का था पर आधुनिकता की मार ऐसी पड़ी की उनके रेडियो से अब समाचार चैनल गायब से होने लगे हैं।

इन बातों की चिंता काका को पहले ही खा चुकी है, काका पहले फड़फड़ाने लगते थे अब तो अस्त होने लगे हैं। ऐसा लग रहा जैसे आधुनिकता अब उनके चौखट पर है जो कभी गाँव की चौहद्दी तक आने में हिचकिचाती थी।

इतना कुछ सोच ही रहा था तभी काका फ़ोन लगाने लग गए दूर शहर अपने बेटे को ये बताने के लिये हाँ वो अहमदाबाद स्टेशन पर पहुँच गया है जैसे उसको ये खबर ही न थी, दरअसल उनका बेटा अभी कुछ दिनों पहले गाँव आया था और उनको ट्रेन के रनिंग स्टेटस के बारे में जानकारी अर्जित करने की विधि बता गया था। रामचनर काका इसका इस्तेमाल अपने तरीके से करते हैं बेचारे बेटे को हर घंटे फ़ोन करके बताते हैं।

“तू इंहा पहुँच गए हो न”

“हाँ बाबा अभी इसी स्टेशन पर हैं, आप देखिए न फ़ोन में, बार-बार बताने की जरूरत नहीं है”

“अरे नहीं हम तो ई चेक कर रहे हैं कि ई ऐप्पवा सही बता रहा है कि नाहीं”

ये वार्तालाप अब काका के आसपास रहने वाले लोगों के लिए आम हो गया है।

वहीं दूर ट्रेन में सफर कर रहे बेटे के लिए दुविधा ये है कि 

“इसे पिता-पुत्र का मोह समझे या आधुनिकता का अत्याचार”।

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