चिड़ियों की चहचहाट, मेरा बचपन और मेरी माँ

मेरे पुराने घर के वेंटिलेटर पर,
हमेशा ही गौरैयों का घोसला लगा रहता।
रोज शाम को ठीक चार बजे,
वे नीचे उतर कर खिड़की पर बैठ जातीं,
मेरे इंतज़ार में।

गांव के सरकारी स्कूल की पीछे की दीवार को फांदकर,
अपना बस्ता लेकर भागता हुआ,
घर की दीवारों, दरवाज़ों से टकराते हुए,
आखिरी कमरे तक पहुँचता,
जहां पर पहले से ही मेरी माँ नीचे जमीन पर बैठकर
सिलाई कर रही होतीं।

बस्ता हवा में उछालकर,
वहीं पलंग के नीचे पड़े बर्तनों में से
थाली खींचता, तसली से चावल निकालता,
और कड़ाही में बची हुई सब्ज़ी से थाली सजाकर
बैठ जाता उन गौरैयों के साथ बांटकर खाने।

माँ को हमेशा तकलीफ होती थी,
क्योंकि कमरे में चावल के दाने
मेरे से ज़्यादा इन चिड़ियों की वजह से फैला होता था।
अचानक से फैली इस अव्यवस्था को देखकर
माँ को गुस्सा आता, पर मेरे हंसते चेहरे को देखकर
फिर से सिलाई में लग जातीं, पर
एक आवाज़ दे देतीं- “मिट्ठू जल्दी सफाई करो
और पास आओ, सुई में धागा डालो।
अंधेरा छा गया है, पिताजी के आने से पहले
इन कपड़ों को निपटाना है।
गाय भी भूखी बंधी है बाहर,
चूल्हा-चौका भी निपटाना है।”

“अभी आया माँ, इन चिड़ियों को खिलाकर,
बस एक-एक दाना चुग लेने दो इन गौरैयों को।”

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