ये इतवार भी क्या गजब ढा गया,
सुबह झटके में नींद खुली,
जब सपने में तुम्हें किसी और का होते देखा।
नींद उड़ी, वह अलग बात,
दिन का चैन छीना,
दिल को बेचैन किया।
नहीं खबर मुझे कि हो क्या रहा,
मनोदशा बिगड़ गई तब।
अचानक से आसपास के लोग,
अनचाही भीड़ लगने लगे।
जिनके बीच खड़ा तो था पर,
कोई समझ न पाया इस बेचैनी को।
इन्हें देखकर ऐसा लगा,
जो पकड़ थी मेरी रिश्तों के समझ पर,
वो आज फिर ढीली पड़ गई।
फिर से खामोशी घिर आई,
बेमौसम बरसात के बादलों की तरह,
जिन्हें आँसू की तरह बरसते देख,
कुछ लोग मौसम का बिगड़ना कहेंगे,
पर जो समझेंगे वो…