गोलघर की गलियों में

सुनो, कुछ मीठा खा लो, सब ठीक हो जाएगा। वैसे, अभी कहाँ हो?

अरे, इधर पटना में गोलघर के पास फंसे हैं। समझ नहीं आ रहा क्या करें… हताशा सा महसूस हो रहा है, पता नहीं क्यों कभी-कभी ऐसा लगता है कि बदनसीबी मेरे हिस्से की जायदाद में किसी ने लिख दी है।

अरे लल्ला, कुछ न होगा। जाओ, देखो आस-पास कोई मिठाई की दुकान होगी। कुछ मीठा खाओ, बदकिस्मती से पीछा छुड़ाओ।

हाँ, दिख रहा है एक दुकान सामने। जाता हूँ।

देखो, पेस्ट्री दिख रही है?

हां, है तो सही पर आज किसका जन्मदिन है?

अरे लल्ला, केक सिर्फ जन्मदिन के दिन ही नहीं खाते।

नहीं, ऐसा नहीं है। हमारे यहां तो सिर्फ हैप्पी बर्थडे वाले दिन ही केक खाते हैं।

हाँ, सुन लिया मैंने। आज बिना हैप्पी बर्थडे के केक खाओ। अच्छा, चलो मैं जाती हूं। अब अपना ख्याल रखना और जरूरी कागजात मिल जाने के पश्चात सूचना जरूर देना।

जैसी आपकी आज्ञा, प्रभु!

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