सफ़रनामा

रेलवे की घड़ी में 14:20 बज रहा था औऱ बिहार सम्पर्क क्रांति अपने निर्धारित समय से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से अपने जड़त्व से गति अवस्था में आ रही थी।स्लीपर कोच में निर्धारित आरक्षण से तिगुनी भीड़। स्थिति साक्षात भारत की जनसंख्या,मानव-पूँजी एवं राष्ट्रीय विविधता दर्शा रही थी।ट्रेन कुछ पांच मिनट तक रेंगती रही फिर धीरे-धीरे अपनी रफ्तार प्राप्त करने लगी। डिब्बे में असामान्य भीड़ का कारण भी असामान्य था।दरअसल ये भीड़ दीवाली के वजह से थी।मेरा उस भीड़ में होना भी समान कारण से हीं था।

वैसे मैं सामान्यतः प्रतिवर्ष दीवाली मनाने गांव जाया करता हूं।कुछ नया नहीं कर रहा हूँ इस बार भी वही‘ बचपन से कछुए की चाल सी प्रगतिशील मेरा गांव’ और ‘सदियों से मनाई जाने वाली दीवाली’| दीवाली मनाने के पीछे का इतिहास लगभग हम सबको पता है।इस पर्व को मनाने का तरीका भी बचपन से अब तक समान हीं रहा है।भरसक मेरा योगदान और भूमिका बदलती गई। फिर भी यह अटल सत्य है कि जब भी गाँव जाता हूं, कुछ नया सा लगता है। हर साल दीवाली मनाता हूँ पर यह भी हर बार कुछ नई लगती है।हाँ शायद इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इस निश्चित परंपराओं,परिवेशों एवं तौर-तरीकों में एकरूपता के बावजूद हमारा जीवन परिवर्तनशील है।हर बार की तरह इस बार भी मैं खुश था, अंदर जल्दी घर पहुंचने की थोड़ी बेचैनी भी थी।शायद पिछले साल के मुकाबले मैं हीं थोड़ा बदल सा गया था।ट्रेन जैसे-जैसे एक-एक स्टेशन पार कर रही थी। लगभग सबके चेहरे पर संतुष्टी के भाव साफ झलक रहे थे। एक बात अजीब लगा ,हो सकता है पहले भी होता आया हो पर मैंने हीं  गौर ने किया हो। जैसा की डब्बे में अधिकांश लोग बिहार के विभिन्न गांवों से थे। सफर के आरंभ में हिंदी में वार्तालाप और ज्यों-ज्यों हम बिहार के करीब आये त्यों-त्यों बातचीत का माध्यम भोजपुरी होते गया। बातचीत में अब चर्चा गांव की खेती गांव की संस्कृति और सबसे महत्वपूर्ण गांव की राजनीति की तरफ बढ़ने लगी। बेशक है सफर काटने का एक अच्छा साधन है परंतु सफर का ये अस्थायी परिवेश जीवन के कई छुए-अनछुए पहलुओं से रूबरू करता है।मैंने भी कई लोगों से बातें की  कुछ घंटों के सफर में मेरे अकेलेपन का एक चीर परिचित संसार में बदलना भी काफी नया एवं रोमांचक रहा।मजेदार बात तो ये है कि वातानुकूलित डब्बे में बैठकर लगता है ट्रैन चल रही है परंतु स्लिपर में लगा कि जिंदगी चल रही है।