28 जुलाई 2015, कोटा, राजस्थान
मुझे बचपन से अखबार पढ़ने की आदत है। कोटा जैसी प्रतिस्पर्धी शहर में अखबार पढ़ रहें हैं तो शायद आप समय व्यर्थ कर रहे हैं, क्योंकि वहाँ का माहौल ऐसा है कि आप पूरा समय परीक्षा की तैयारी में झोंकते है।
अपनी दैनिक दिनचर्या का पालन करते हुए उस दिन भी 11 बजे नाश्ता करने मेस के लिए निकला जहाँ अखबार भी पढ़ा करता था। अब तक सब कुछ सामान्य थ। मेस वाले भैया को राधे-राधे कहा, उन्होंने हर दिन की भांति अखबार मेरे हाथों सुपुर्द किया। अखबार हाथों में लेते ही मानो बदन में बिजली सी कौंध गय। अभी तक जो दिन सामान्य लग रहा था, एक क्षण के भीतर ही सामान्यता की परिभाषा को झुठलाने लगा था। अखबार का मुख्य शीर्षक हृदय विदारक था “नीला आसमान सो गया, ऐसा शून्य जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगा…कलाम नहीं रहे”।
अब तक इनसे मिलने के सपने देखा करता था और ये तो कल ही मेरे जैसे अनगिनत सपने देखने वालों को बिना बताये चले गय। आपने सही नहीं किया, अभी तो हमारा मिलना बाकी थ। बस यही निकला मुख से और उनके सम्मान में आखों की नमी अखबार के पन्नों पर बिखर गया। मुख्य पृष्ठ देखते एवं सोचते में 11:30 हो चला था, मेस वाले भैया ने आवाज़ लगाई
जवाब में सिर्फ इतना ही निकला, “अब हो गया भैया मैं चलता हूँ|”
“अरे ऐसे कैसे खाना तो खा के जा,” उन्होंने कहा।
“आज इच्छा नहीं हो रही कुछ खाने की”, कह कर वहाँ से वापस कमरें की तरफ चल पड़ा!
पांचवी पुण्य तिथि पर पूरा देश उनको नमन कर रहा है।
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