गुजर गए दिन हफ्ते,साल और यहाँ तक की पूरा एक दशक
घर जाने के इंतज़ार में
जहां हर इक दुपहरी सिर्फ बातों में जाया करते थे
आज सिमट गई है दो ढाई मिनट की बात में
जिसके गोद में सोया करता था मैं
एक ही सवाल करती थी वो हर बार
‘अबकी जो जा रहे हो फिर कब आवोगे’
वो भी गुजर गई इस साल के शुरुआत में
मेरी दादी थी वो जो गुजर गयी शायद मेरे इंतज़ार में
कभी कभी सोचता हूं बदल से गए हैं घरवाले मेरे क्योंकि
इक अरसा हो गया किसी ने पूछा नहीं
कि घर कब आवोगे
फिर याद आता है जो गुजर गयी वो दादी थी मेरी
जो अकसर पूछ लिया करती थी कि
रे मिट्ठू
फगुआ में तो आया नहीं और चैती छठ में तेरा इम्तेहान था
सावन में तो नए सत्र की शुरुवात थी….फिर मैं मुस्कुरा के कहता
‘दादी कार्तिक में फिर से इम्तेहान है लगता है दीवाली और छठ भी निकल जायेगा’!
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