कुछ यादें ऐसी भी!

कॉलेज के पहले हीं दिन शिवेंद्र अपने पिताजी को स्टेशन छोड़कर वापस छात्रावास में आया तो खुश था कि चलो वर्षों कि तपस्या समाप्त हुई अब ये आखिरी छात्रावास है| इंजीनियरिंग के बाद तो  एक अच्छी नौकरी होगी,अपना घर होगा मतलब पूरी तैयारी चल रही थी उसके दिमाग में तभी फ़ोन में पिताजी का मिस्ड कॉल देखकर भावुक हो गया| शायद उसको याद आ गया 11 साल पुराना वो दिन जब पिताजी उसको शहर के एक छात्रावास में छोड़कर घर चले गये थे,उस दौर में जब गाँव से इक्का-दुक्का लोग हीं शहर जाते थे पढ़ने के लिए|

घर से दूर तो शिवेंद्र भी नहीं जाता,वो तो महज एक संयोग था,घर के सभी सदस्य चचेरे भाई की शादी में व्यस्त थे| उस क्षेत्र में ‘छोटू गणितज्ञ’ के तमगे से नवाजे गये शिवेंद्र बाबू छत पर बैठ कर चौथी कक्षा में होने के वावजूद आठवीं कक्षा के गणित को स्पीकर पर बज रहे गाने को गुनगुनाते हुए दनादन सॉल्व किये जा रहे थे और ये सब देखे जा रहे थे शिवेंद्र के भावी मास्टर जी| शिवेंद्र के भावी मास्टर जी उस समय जिले के गिने चुने गणितज्ञों में से एक थे| शायद मास्टर जी को 9 साल के शिवेंद्र में उसके अपने उम्र के बच्चों से ज्यादा योग्यता दिखा तभी तो उन्होंने अपने छात्रावास में नि:शुल्क रहने का अवसर दे दिया| 

शादी सम्पन्न हुआ,घर में बेटे की शादी थी लेकिन फिर भी एक बिदाई हुई क्योंकि शिवेंद्र अपने माँ,बहन,बड़े भाई,घर और गांव के साथ छोड़कर जा रहा था उन यादों को जो जुडी थी उसके खेतों से,खलिहानो से,वो जा रहा था दूर शहर छात्रावास में अपना बाकी का बचा हुआ बचपन बिताने को|

उसे तो लग रहा था कि कुछ दिनों कि हीं तो बात है पढ़ाई पूरी करके वापस लौट आना है इन्ही झोपडिओं में| उसे नहीं पता था कि 

“गणित अब सिर्फ अंकों का खेल नहीं रहा,अब रिश्तों के जोड़ घटाव में भी गणित लगानी होगी”|

पिछले ग्यारह साल कि यादें एक साथ उसके दिमाग में चोट कर रही थी कहाँ वो चला था चंद दिन छात्रावास में बिताने यहाँ तो कुल ग्यारह साल बिता दिए उसने उस दिन के इंतज़ार में जब वो वापस जायेगा अपने घर परिवार में| इन्ही यादों के बीच आंसुओं कि कुछ बुँदे टपक पड़ी मोबाइल स्क्रीन पर…..”हेल्लो पिताजी! चरण स्पर्श, यहाँ सब ठीक है मैं अपने कमरे में हूँ आप ठीक तो हैं न?” इस प्रश्न के पूछने के कारण को सिर्फ शिवेंद्र और उसके पिताजी जानते थे,दोनों को याद है कैसे वो पहली बार छात्रवास से एक दूसरे से विदा होने के समय लिपट कर रोये थे|

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