इश़्क-ए-दिल्ली

सुब के 8 बज रहें हैं और आप सुन रहे हैं देश की सुरीली धड़कन, विविध भारती! 

आइये सुनते हैं फिल्म ‘फ़िर कब मिलोगी’ से मज़रूह सुल्तान पुरी का लिखा ये गीत जिसे संगीत दिया है राहुलदेव वर्मन ने और आवाज दी है मुकेश और लता ने | 

“कहीं करती होगी,वो मेरा,इन्तज़ार, जिसकी तमन्ना में, फिरता हूँ बेक़रार…!”

आँखें मींचते हुए जब मैंने खिड़की से बाहर देखा तो दिल्ली दौड़ रही थी। रंगीन मेट्रो और बसों के जाल ने पूरी दिल्ली को जोड़ दिया है| हालाँकि एल.पी.जी. से चलने वाले ऑटो शोर नहीं करते पर नसों में बही जा रही ये दिल्ली के जीने का तरीका मेरे मन को व्यग्र कर देने के लिए काफी है।सच तो यह है कि दिल्ली का मन में ख़्याल भर आना रोमांचित कर देता है। वैसे तो छात्रावास में रहते हुए अभी तीन दिन हुए थे, पर ना जाने क्यों गाँव की याद कुछ ज्यादा हीं आ रही थी। शायद इसलिये क्योंकि गाँव के प्यार पर इस नई प्रेमिका दिल्ली का अाधिपत्य होने जा रहा था। तब हमें क्या अंदाज़ा था कि यह दिल्ली इस मन को इतना भा जाएगी और भाये भी क्यूँ ना, कितनी यादों को तो कैद कर रखा है इसने खुद में| आते समय जहाँ पहले हीं दिन एक नीले कोट वाली मैडम के जबरदस्त फर्राटेदार अंग्रेजी ने मुर्च्छित-सा कर दिया था, अभी भी याद है वह पहला मेट्रो सफ़र| खैर, दिल्ली को और जानना है तो सुनो, मुझे आंखे बंद करने दो और फ़ोन में रेडियो भी लगाने दो क्योंकि गाना सुने बिना दिल्ली-भ्रमण अधूरा-सा है| अभी मेट्रो के लिए क़तार में लगा हीं था कि आंखों पर चश्मे को चढ़ाए कानों में छोटी-छोटी रिंग्स के बीच इयरफोन लगाए वह भी दरवाज़े तक जाने का प्रयास करती नजर आई। कितनी मशक्कत और गणित लगाने के बाद उस तक पहुँचा हीं था कि मेट्रो के दरवाज़े बंद हो गए। शीशे के अंदर से हथेली पर हथेली चिपकाने के अधूरे प्रयास के बाद मन हीं मन बाय बोल गया। शायद यह हाई स्कूल के बाद दूसरी बार था,जब मैं उससे मिलते-मिलते रह गया था।

यह शहर इश्क़ सिखाता है, किसी एक चीज से नहीं बल्कि यहाँ मौजूद हर चीज से। वैसे भी इस दिल्ली की तो सड़कें, गलियां ,चौराहे यहाँ तक कि मौसम में भी इश्क़ है। सच तो यह है कि ये जो लोग हैं न प्यार करते-करते बाहों में बाहें डाले मेट्रो में सीढ़ियां चढ़ते या सफेद कुर्ते में टाई लगा कर दौड़ते-दौड़ते बस पकड़ते हैं यही दिल्ली को अब तक जिंदा रखे हुए हैं।मेरा दिल्ली से इश्क़ तो लाल किला भ्रमण के दौरान हीं पनपने लगा था लेकिन परवान चढ़ा जब हमने चांदनी चौक भी पैदल हीं घुमा। शुरुआत 1870 के दशक से चली आ रही गलि पराठे वाली से हुई| यहां के स्ट्रीट फूड से प्यार होना भी स्वाभाविक है। कह तो रहा हूँ यहां कदम-कदम पर इश्क़ होता है तभी तो इसका नाम दिल्ली है। पुरानी दिल्ली में घुमते वक़्त दीवारों और गलियों में ‘ग़ालिब’ का अश्क़ दिख जाना भी आम बात है। ईद के महीने में ज़ामा मस्जिद के आस-पास के दुकानों से आ रही अफगानी और तुर्की ‘ काजू-पिस्ते व खजूर’ की सुगंध आपको बरबस हीं शाही रुतबे का एहसास करा देगा। इन सबके अलावा चम-चमाती हुई काले रंग की लंबी-लंबी गाड़ियों से भी आपको प्यार हो सकता है या आपका प्यार सीधा इंडिया गेट से होते हुए जाकर गिर सकता है रायसीना हिल्स पर। अगर वहां प्यार होते-होते रह गया तो फिर मुगल बाग के अंदर मौजूद विभिन्न  प्रकार के रंग-बिरंगे फूल आपका इन्तेज़ार कर रहे होंगे | वैसे भी हम कितना भी इंसानों से या फूलों से प्यार कर लें पर ये जो पावर ऑफ स्ट्रक्चर है न, जहाँ कुर्सी के फैसले किये जाते हैं, उसके आगे सब कुछ फेल है।शायद इन्हीं गलियों से होकर काली दिल्ली का रास्ता जाता है,लेकिन हम तो ठहरे ‘सुंदरता के शौक़ीन’। ऐसे में मन का दिल्ली में फिसलकर गिर जाना कोई बड़ी बात नहीं। एक हाथ में डेयरी मिल्क और दुसरे हाथ की उंगलियों से चेहरे पर आ गिरी लटों को कान के पीछे खोंसती हुई, किसी लड़की का आकर आपको ‘ एक्सक्यूज़ मी’ कहना आपको पल भर के लिए रोमांचित तो कर हीं सकता है। ऐसे में इस दिल्ली से प्यार होना लाज़िम है।लौटते वक़्त मन अग़र कनॉट प्लेस या सेंट्रल पार्क में रुक जाए तो प्रेम सौ-फीसदी परवान चढ़ चुका होता है| मॉल की दीवारों से चिपकने से बेहतर यहाँ के सेंट्रल पार्क मे सबसे ऊपर लहर रहे तिरंगें को सलामी दे लो।

“वैसे तुम्हारी दिल्ली सच में खुबसूरत है!”