अन्तर्दद्व

आखिर बात क्या है? मुझे हुआ क्या है? पहले तो ऐसा नहीं था।मैं बचपन से छात्रावास में रह हूं लेकिन अब यहाँ रहने में घुटन क्यों महसूस हो रही है। क्यों आजकल कोई भी चेहरा वास्तविक नहीं लगता? क्यों हर चेहरा पर एक अजीब तरह का मुखौटा होने का आभास होता है,जो बीते कल और आज के पल में खुद अपने मुखौटे को बदलती नजर आती है।इस बनावटी दुनिया से ऊब चुका हूं मैं। अब तो सुकून और वास्तविकता की चाह हो चली है। इतना सोचने के बाद चांद की रौशनी में कुछ देर अकेले बैठा ,थोड़ी देर बाद आभास हुआ, चाँद तो हर रोज नए मुखौटे में आता है फिर हर रोज इतना प्यारा क्यों लगता है? कारण जो हो लेकिन…

‘अब बेसबब मुस्कुरा देता हूँ जब कभी चाँद नज़र आता है’|

ये जो सुकून मिलता है यहां बैठ कर यही सुकून ‘हमारी कमज़ोरी’ है।’सुकून’ ये बेहद ही व्यक्तिगत शब्द है। इसके होने या न होने का आभास एक व्यक्ति स्वयं कर सकता है। पर बड़ा सवाल ये है कि ये मिले कैसे? जी हाँ, ये सुकून व्यष्टिगत कर्तव्य से उत्पन्न व्यक्तिगत मानसिक संतुष्टि ही है। इसे सरल शब्दों में हम यूं कह सकते है कि जब हम आपने समाज में अहैतुक भाव से कोई कार्य करते है जो किसी कि आवश्यकता को पूर्ण करता है। उस पूर्ति के बाद उस व्यक्ति के चेहरे की मुस्कान या जीव की   आत्मीयता हमें एक अलौकिक सुख देती है,इसे ही सुकून कह सकते हैं।अर्थात जीवन का सुख और सुकून परमार्थ में ही निहित है। मैं स्वंय इसे रोज़ महसूस करता हूं। जो कार्य मेरी अपनी जरूरत होती है, मैं उसे बेहद उत्सुक होकर करता हूं। जहाँ केवल अपना स्वार्थ होता है और जैसे ही उस कार्य में सफल हो जाता हूँ।उत्सुकता खत्म हो जाती है। स्वार्थ सिद्ध होने के बाद वो कार्य तब मेरे लिए बस आवश्यकता पूर्ति का एक निर्जीव माध्यम लगने लगता है। उसके प्रति कोई विशेष लगाव या फिर स्मृति नहीं रह पाती है।परंतु जब भी कोई कार्य बस एक कार्य समझकर या फिर उससे समष्टि से जोड़कर या परहित को ध्यान में रखकर करता हूं।तब मैं स्वयं को जिम्मेदार पता हूं।इसमें कार्य सिद्धि के बाद भी एक मानसिक संतुष्टि हमेशा बनी रहती है।

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