वशिष्ठ जी का अवसान

कल बिहार के अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर एक ऐसी खबर छपेगी, जिससे तमाम युवा वर्ग जो गणित और भौतिकी में रुचि रखते हैं या कभी रखते थे, उनमें मातम छाएगा। कई ऐसे भी होंगे, बिल्कुल मेरी तरह, जो इस महान गणितज्ञ से कभी मिलने के सपने देखा करते थे। मैं महसूस कर सकता हूँ उस दर्द को, जो कल दसवीं से बारहवीं तक के बच्चे महसूस करने वाले हैं, क्योंकि कलाम नहीं रहे, ‘नीला आसमान सो गया’ जैसी ही कोई दिल दहलाने वाली हेडलाइन होगी। तब कोटा में जो मैंने झेला था, वही कल बिहार के बच्चे झेलेंगे। चारों तरफ उदासी छाई होगी, बिहार के लाल वशिष्ठ जी के गुजर जाने से शिक्षा जगत हुआ बेहाल… ऐसी खबरें गूंज रही होंगी। बिहार में ऐसे तीव्र और कुशाग्र बुद्धि वाले लोगों का अपमान होते आया है, शायद तभी विज्ञान में रुचि रखने वाला हर बच्चा बिहार से दूर जाना चाहता है… सबको पता है कि भ्रष्टाचार की वजह से उसकी पहचान लंबी पहुंच वाले लोगों के नीचे दब जाएगी…. उसे वो सारी सुविधाएं नहीं मिल पाएंगी जिसका वह हकदार होगा। वशिष्ठ जी भी इन्हीं रास्तों से गुजरे… उन्हें भी पहचान बिहार के बाहर ही मिली पर बिहार की गोद में जब वापस आए, हर सरकार उनकी मौजूदगी को दरकिनार करती रही… कभी-कभी अखबारों से ही खबर मिलती कि वशिष्ठ जी की तबियत बिगड़ रही है, तो कभी मिलती कि उनकी दिमागी हालात ठीक नहीं हैं… तो कभी दोस्तों को शैक्षणिक उपलब्धि के लिए वशिष्ठ जी से सम्मानित किए जाने की खबर मिलती। ऐसे में आज उनके गुजर जाने की खबर मिली, मायूसियों ने घर कर लिया… तब कलाम के जाने का दुख था, अब वशिष्ठ जी के जाने का है। ये अलग बात है कि विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने के बाद भी भारत के कम लोग ही उनसे अवगत हो पाए, उनके उपलब्धियों को जान पाए… शायद इस देश के लोग ही न पहचान पाए उन्हें, वरना इस बिहारी के दिल में उतना ही दर्द है, जितना कलाम के जाने पर हुआ था। मेरे खयाल में दोनों बराबर थे, हैं और रहेंगे। महान गणितज्ञ स्वर्गीय श्री वशिष्ठ नारायण सिंह जी को इस टूटे मन से श्रद्धांजलि।

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